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== | == पूर्व शारीरिक जन्म (Embodiments) == | ||
यीशु (Jesus) पहली बार [[Special:MyLanguage/Sanat Kumara|सनत कुमार]] के साथ एक स्वयंसेवक के रूप में पृथ्वी पर आए थे, उसके बाद वे कई बार पृथ्वी पर अवतरित हुए। | यीशु (Jesus) पहली बार [[Special:MyLanguage/Sanat Kumara|सनत कुमार]] के साथ एक स्वयंसेवक के रूप में पृथ्वी पर आए थे, उसके बाद वे कई बार पृथ्वी पर अवतरित हुए। | ||
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<span id="King_David"></span> | <span id="King_David"></span> | ||
=== डेविड, राजा (King David) === | === डेविड, राजा (King David) === | ||
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पूर्वी और पश्चिमी देशो में कई जन्म लेने व् विभिन्न दीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के बाद यीशु ने अपने अंतिम अवतार में जन्म लिया। इन सब जन्मों के समय उन्होंने अपने कर्म का एक छोटा भाग अपने भविष्य के मिशन के लिए बचाये रखा था - इसे उन्होंने तैंतीस साल की उम्र में फिलिस्तीन (Palestine) छोड़ने के समय संतुलित किया। यीशु ने यह जान लिया था कि उनके पुराने गुरु अलाइजा (Elijah) ने इस जन्म में जॉन द बैपटिस्ट (John the Baptist) के रूप में जन्म लिया है और ऐसा उन्होंने अपने चेले (यीशु) के लिए रास्ता तैयार करने के लिए किया था। | पूर्वी और पश्चिमी देशो में कई जन्म लेने व् विभिन्न दीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के बाद यीशु ने अपने अंतिम अवतार में जन्म लिया। इन सब जन्मों के समय उन्होंने अपने कर्म का एक छोटा भाग अपने भविष्य के मिशन के लिए बचाये रखा था - इसे उन्होंने तैंतीस साल की उम्र में फिलिस्तीन (Palestine) छोड़ने के समय संतुलित किया। यीशु ने यह जान लिया था कि उनके पुराने गुरु अलाइजा (Elijah) ने इस जन्म में जॉन द बैपटिस्ट (John the Baptist) के रूप में जन्म लिया है और ऐसा उन्होंने अपने चेले (यीशु) के लिए रास्ता तैयार करने के लिए किया था। | ||
जॉन द बैपटिस्ट ने यीशु के बारे में कहा, "उसे बढ़ना चाहिए और मुझे कम होना चाहिए।"<ref>जॉन ३:३०।</ref> इसके बाद गुरु पीछे हट गए ताकि यीशु उस युग (मीन युग) में प्रभु | जॉन द बैपटिस्ट (John the Baptist) ने यीशु के बारे में कहा, "उसे आत्मिक ज्ञान में अवश्य | ||
बढ़ना चाहिए और मुझे कम होना चाहिए।"<ref>जॉन ३:३०।</ref> इसके बाद उनके गुरु पीछे हट गए ताकि यीशु उस युग (मीन युग) में प्रभु के प्रभावशाली अवतार बन पाएं। | |||
बारह से तीस वर्ष की आयु | बारह से तीस वर्ष की आयु में यीशु ने [[Special:MyLanguage/Ascension Temple|उत्थान का मंदिर]] (Ascension Temple) और हिमालय के बाहरी और भीतरी दोनों स्थानों में अध्ययन किया। मिश्र में स्थित लक्सर (Luxor) में उत्थान के मंदिर (Ascension Temple) के प्रमुख [[Special:MyLanguage/Serapis Bey|सेरापिस बे]] (Serapis Bey) ने बताया है कि यीशु युवावस्था में लक्सर आये थे। उन्होंने यह भी बताया है कि यीशु ने किसी भी प्रकार का सम्मान लेने से इंकार कर दिया; वह समर्थक (Hierophant) के रूप में सर झुका कर खड़े हो गए और उन्होंने आध्यात्मिक नियम एवं रहस्य विद्या में दीक्षा लेने की इच्छा प्रकट की। यद्यपि वह सर्वोच्च सम्मान के हकदार थे परन्तु उनके चेहरे पर अहम् का कोई भाव नहीं था, और न ही कोई गर्व का भावना या झूठी उम्मीद।<ref>{{DOA}}, पृष्ठ ३३.</ref>+ | ||
{{Main-hi|Lost years of Jesus|यीशु के खोये हुए वर्ष}} | {{Main-hi|Lost years of Jesus|यीशु के खोये हुए वर्ष}} (Lost years of Jesus) | ||
यीशु की | यीशु की पूर्वी क्षेत्रों की यात्रा का वर्णन करने वाले सूचीपत्र आज भी कश्मीर में लद्दाख की एक घाटी में एक मठ में संरक्षित हैं। भारत में उन्होंने [[Special:MyLanguage/Great Divine Director|महान दिव्य निर्देशक]] (Great Divine Director), [[Special:MyLanguage/Lord Maitreya|मैत्रेय]] (Lord Maitreya) और भगवान [[Special:MyLanguage/Himalaya|हिमालय]] (Himalaya) की देखरेख में | ||
अध्ययन किया। यहीं पर उन्हें अपने मिशन के लिए मुख्य मंत्र मिले, जिन्हें बाद में उन्होंने अपने शिष्यों को सिखाया। इनमें से कुछ मंत्र यीशु द्वारा मार्क प्रोफेट (Mark Prophet) को दी गयी दिव्य वाणी "द ट्रांसफ़िगरिंग अफ़र्मेशन्स" (The Transfiguring Affirmations) में शामिल हैं। | |||
अपने अंतिम अवतार से पहले यीशु [[Special:MyLanguage/Zadkiel|जैडकीयल]] के वर्ग | अपने अंतिम अवतार के रूप में आने से पहले यीशु [[Special:MyLanguage/Zadkiel|जैडकीयल]] (Zadkiel) के वर्ग (order) के सदस्य थे। यहाँ उन्होंने आह्वान (invocation) और [[Special:MyLanguage/alchemy|रसायन शास्त्र]] (alchemy) की विद्या हासिल की थी। इस ज्ञान ने उन्हें पानी को मदिरा (wine) में बदलने, समुद्र को शांत करने, बीमार लोगों को ठीक करने और मृतकों को जीवित करने में सक्षम बनाया। | ||
सूली पर चढ़ने और पुनरुत्थान के बाद यीशु कश्मीर चले गए। यहाँ वे ८१ वर्ष की आयु तक रहे। जीवन के समापन पर उन्होंने [[Special:MyLanguage/Shamballa|शम्बाला]] के आकाशीय आश्रयस्थल से | सूली पर चढ़ने और पुनरुत्थान के बाद यीशु कश्मीर चले गए। यहाँ वे ८१ वर्ष की आयु तक रहे। जीवन के समापन पर उन्होंने [[Special:MyLanguage/Shamballa|शम्बाला]] (Shamballa) के आकाशीय आश्रयस्थल (etheric retreat) से आध्यात्मिक उत्थान किया। | ||
<span id="World_Teacher"></span> | <span id="World_Teacher"></span> | ||
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{{Main-hi|World Teacher|विश्व गुरु}} | {{Main-hi|World Teacher|विश्व गुरु}} | ||
आध्यात्मिक उत्थान के बाद यीशु छठी किरण के [[Special:MyLanguage/chohan|चौहान]] बन गए। १ जनवरी १९५६ को जब सनत कुमार [[Special:MyLanguage/Venus|शुक्र]] पर लौटे तो यीशु ने मैत्रेय की जगह विश्व शिक्षक का पद ग्रहण किया, और मैत्रेय पूरे ग्रह के बुद्ध बन गए। | आध्यात्मिक उत्थान के बाद यीशु छठी किरण के [[Special:MyLanguage/chohan|चौहान]] (chohan) बन गए। १ जनवरी १९५६ को जब सनत कुमार [[Special:MyLanguage/Venus|शुक्र]] ग्रह पर लौटे तो यीशु ने मैत्रेय (Lord Maitreya) की जगह विश्व शिक्षक (World Teacher) का पद ग्रहण किया, और मैत्रेय पूरे पृथ्वी ग्रह के बुद्ध बन गए। | ||
<span id="Mission_today"></span> | <span id="Mission_today"></span> | ||
== आज का लक्ष्य == | == आज का लक्ष्य == | ||
यीशु हमें दिव्यगुरुओं | यीशु हमें दिव्यगुरुओं की देखरेख में शिष्यता के मार्ग पर चलने के लिए कहते हैं। उन्होंने इस पथ पर चलने के लिए प्रार्थनाओं की एक श्रृंखला बताई है जो ''वॉकिंग विद द मास्टर: आंसरिंग द कॉल ऑफ जीसस'' (Walking with the Master: Answering the Call of Jesus) <ref>{{WWM}}</ref> पुस्तक में प्रकाशित की गई है। कुम्भ युग के अपने शिष्यों से यीशु कहते हैं, “मित्र के लिए अपने प्राण त्यागना प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण है ।<ref>जॉन १५:१३.</ref> मेरे प्रिय जनों, मैं मृत्यु की नहीं, बल्कि एक जीवंत जीवन की बात कर रहा हूँ - एक ऐसा जीवन जो मेरे दिल तक पहुंचने के लिए जीया गया है। ऐसा व्यक्ति ही एक सच्चा शिष्य है जो ईश्वर के संदेश का प्रचारक कहलाने का अधिकार रखता है।वह ही प्रकाश का दूत और प्रकाश का संवाहक माना जाता है। {{POWref|३०|२७|, ५ जुलाई, १९८७}}</ref> | ||
<span id="Retreats"></span> | <span id="Retreats"></span> | ||
== आश्रयस्थल == | == आश्रयस्थल == | ||
{{main-hi|Resurrection Temple| | {{main-hi|Resurrection Temple|पुनरुत्थान का मंदिर}} (Resurrection Temple) | ||
{{main-hi|Arabian Retreat|अरेबियन आश्रय स्थल}} | {{main-hi|Arabian Retreat|अरेबियन आश्रय स्थल}} (Arabian Retreat) | ||
यीशु का आश्रय स्थल | यीशु का आश्रय स्थल पुनरुत्थान का मंदिर (Resurrection Temple) है जो पृथ्वी के ऊपर आकाशीय क्षेत्र में स्थित है। वह लाल सागर के उत्तर-पूर्व में अरेबियन रेगिस्तान में अरेबियन आश्रय स्थल में भी सेवा करते हैं। | ||
ईसा मसीह | ईसा मसीह के प्रकाश को उनके [[Special:MyLanguage/keynote|मूल राग]] (keynote), "जॉय टू द वर्ल्ड" (Joy to the World) के वादन के माध्यम से आकर्षित किया जा सकता है। | ||
<span id="See_also"></span> | <span id="See_also"></span> | ||
== इसे भी देखिये == | == इसे भी देखिये == | ||
[[Special:MyLanguage/Magda| | [[Special:MyLanguage/Magda|मागडा]] (Magda) | ||
[[Special:MyLanguage/Jesus and Mary Magdalene|यीशु और मेरी मैगडालींन]] | [[Special:MyLanguage/Jesus and Mary Magdalene|यीशु और मेरी मैगडालींन]] (Jesus and Mary Magdalene) | ||
[[Special:MyLanguage/Lost years of Jesus|यीशु के खोये हुए वर्ष]] | [[Special:MyLanguage/Lost years of Jesus|यीशु के खोये हुए वर्ष]] (Lost years of Jesus) | ||
[[Special:MyLanguage/Joseph of Arimathea|अरिमाथीया का जोसफ]] | [[Special:MyLanguage/Joseph of Arimathea|अरिमाथीया का जोसफ]] (Joseph of Arimathea) | ||
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