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(3d ed., rev. (Blauvelt, N.Y.: Garber Communications, Freedeeds Library, 1986), p. 159.</ref>) | (3d ed., rev. (Blauvelt, N.Y.: Garber Communications, Freedeeds Library, 1986), p. 159.</ref>) | ||
जब जीवात्माएं अपने स्रोत पर (ईश्वर के पास) लौटने का निर्णय कर लेती हैं तो उनका लक्ष्य खुद को अज्ञानता और अंधकार से मुक्त करना होता है। इस प्रक्रिया में कई जन्म लग सकते हैं। महाभारत में जीवात्मा की शुद्धिकरण की प्रक्रिया की तुलना सोने को परिष्कृत करने की प्रक्रिया से की गई है - जिस प्रकार सुनार धातु को शुद्ध करने के लिए बार-बार आग में डालता है वैसे ही स्वयं को शुद्ध करने के लिए जीवात्मा को बार बार पृथ्वी पर आना पड़ता है। महाभारत हमें यह भी | जब जीवात्माएं अपने स्रोत पर (ईश्वर के पास) लौटने का निर्णय कर लेती हैं तो उनका लक्ष्य खुद को अज्ञानता और अंधकार से मुक्त करना होता है। इस प्रक्रिया में कई जन्म लग सकते हैं। महाभारत में जीवात्मा की शुद्धिकरण की प्रक्रिया की तुलना सोने को परिष्कृत करने की प्रक्रिया से की गई है - जिस प्रकार सुनार धातु को शुद्ध करने के लिए बार-बार आग में डालता है वैसे ही स्वयं को शुद्ध करने के लिए जीवात्मा को बार बार पृथ्वी पर आना पड़ता है। महाभारत हमें यह भी बताता है हालाँकि एक आत्मा "महान प्रयासों" से एक जीवन में खुद को शुद्ध कर सकती है, लेकिन अधिकांश आत्माओं को खुद को शुद्ध करने के लिए "सैकड़ों जन्मों" की आवश्यकता होती है। <ref>किसारी मोहन गांगुली द्वारा अनुवादित ''द महाभारत औफ कृष्ण-द्वैपायन व्यास'', खंड १२ (नई दिल्ली: मुंशीराम मनोहरलाल, १९७०), ९:२९६।</ref> पूरी तरह से शुद्ध होने पर आत्मा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो परब्रह्म के साथ मिल जाती है। आत्मा "अमर हो जाती है।"<ref>श्वेताश्वतर उपनिषद, प्रभावानंद और मैनचेस्टर में, ''द उपनिषद'', पृष्ठ ११८.</ref> | ||
<span id="Buddhist_teaching"></span> | <span id="Buddhist_teaching"></span> | ||
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